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वर्षाकालीन फल पौधों की दर
शरदकालीन फल पौधों की दर
आर. एफ. डी.
मौन पालन का विकास

उद्देश्य :

    1. प्रदेश में फल फसलों की उत्पादकता बढ़ाने तथा परागण हेतु बागवानों को मौन वंश प्रदान करना |
    2. मौन प्रजातियों को पालतू बनाना जिससे की प्रकृति में पारिस्थितिकी संतुलन बना रहें |
    3. परागण, निष्कर्षण एवं प्रदर्शन और शहद की उपयोगिता तथा अन्य मौन पालन उत्पादों के लिए छोटे-छोटे मौन पालन गृहों को बनाना |
    4. वैज्ञानिक मौन पालन हेतु किसानो की सहभागिता को प्रोत्साहित करना |
    5. राज्य में किसानो को तकनीकी ज्ञान प्रदान करने के लिए छोटी अवधि वाले मौन पालन प्रशिक्षण शिविरों का आयोजन करना |
    6. बेरोजगार युवाओं को उनकी आजीविका के साधन के रूप में मौन पालन को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना |

 

हिमाचल प्रदेश में आधुनिक मौन पालन, वर्ष 1934 में कुल्लू घाटी में और वर्ष 1936 में काँगड़ा घाटी में आरम्भ किया गया था | राज्य में वर्ष 1961 में भारतीय एपिस कैराना इंडिका की प्रजाति को पाला जाता था, जबकि इटालियन एपिस मैलीफिरा प्रजाति की मधुमखियों को राज्य के मौन अनुसन्धान केन्द्र काँगड़ा (नगरोटा) में पाला गया था | फल उद्योग में मौन पालन की महत्वता को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1971 में कृषि विभाग के विभाजन के समय बागवानी विभाग को कृषि विभाग से स्थानांतरित किया गया था|

 

अप्रैल 1971 से पूर्व पूरे प्रदेश में आधुनिक मौन गृहों में केवल 1250 मौन छतों को रखने का प्रावधान था | वर्ष 1971, में इस योजना का बागवानी विभाग में स्थानांतरण होने के बाद मौन पालन के क्षेत्र में मौन पालकों की वृद्धि हुई है |

 

फल पौध के परागण हेतु एवं मूल्यवान मधु के उत्पादों की महत्वता को ध्यान में रखते हुए उद्यान विभाग राज्य में मौन पालन योजना को प्राथमिकता के आधार पर रख कर प्रगति की ओर अग्रसर किया है | इस समय उद्यान विभाग द्वारा राज्य के विभिन्न उपयुक्त स्थानों पर 32 मौन पालन प्रदर्शन गृह स्थापित किये गये है | पूरे प्रदेश को दो क्षेत्रों में बांटा गया है अर्थात् उतरी एवं दक्षिणी क्षेत्र | दक्षिणी क्षेत्र में 17 मौन पालन प्रदर्शन गृह जबकि उत्तरी क्षेत्र में 15 मौन पालन प्रदर्शन गृह है | 1983-84 से पूर्व एपिस कैराना इंडिका प्रजाति की मधुमखियाँ दक्षिणी क्षेत्र के सभी मौन पालन गृहों में पाली जाती थी, और एपिस मैलीफिरा प्रजाति की मधुमखियाँ को केवल उत्तरी क्षेत्रों में ही पाला जाता था |वर्ष 1983-84 के बाद एपिस कैराना प्रजाति की मधुमखियाँ स्कैबरौड़ के कारण लुप्त होने लग गई थी | विभाग द्वारा 90 प्रतिशत से अधिक मौन गृह नियंत्रित किया जाता है तथा इसके अतिरिक्त अन्य मौन पालन गृह निजी क्षेत्र से सम्बंध रखते है,एपिस मैलीफिरा प्रजाति की मधुमखियों को मौन गृहों में न रख कर दीवारों में रख कर पाला जाता है | सर्दियों के मौसम के दौरान मौन पालकों के द्वारा मौन छतों को अन्य गर्म राज्यों में रखा जाता है जिस कारणवश राज्य के मौन गृहों में शहद की कमी हो जाती है |

 

वर्ष 1981-82 में हिमाचल प्रदेश में एपिस मैलीफिरा प्रजाति के आंकडों के आधार पर 4200 मौन पालन गृह उपलब्ध थे | जबकि इस समय प्रदेश में 80,000 मौन पालन गृह है, जहां पर 1500 बेरोजगार शिक्षित युवाओं को पूर्ण रोजगार प्राप्त हुआ है |ये मौन पालन गृह प्रतिवर्ष 1600 मी० टन शहद उत्पादन करने की क्षमता रखतें है जबकि वर्ष 1981-82 के दौरान 3 मी० टन शहद का उत्पादन किया जाता था |

 

फल पौधों के परागण हेतु मौन वंशों के इलावा अन्य किसी पदार्थ की कोई आवश्यकता नहीं होती | प्रमाणित तथ्यों के आधार पर यह पता चलता है कि मौन वंशों के कारण फल फसलों के उत्पादन में वृद्धि हुई है और साथ ही मौन पालन गृहों में भी 10 से 20 गुणा अधिक शहद प्राप्त किया जाता है | विभाग द्वारा बागों में निम्न दर फल फसलों के परागण हेतु मौन गृहों की व्यवस्था की जाती है| नवीनतम अनुमानों के आधार पर प्रदेश में फल पौधों के परागण हेतु बागों में लगभग 2,00,000 मौन कलोनियों की आवश्यकता होती है |

 

विभागीय योजनाएं

 

अ.राज्य योजना :

 

  1. उद्यान विभाग द्वारा सात दिवसीय मौन पालन प्रशिक्षण शिविर पर रु० 50.75 प्रति प्रशिक्षणार्थी दैनिक भत्ता दिया जाता है |
  2. उद्यान विभाग द्वारा मौन पालकों को मैन गृहों एवं अन्य आवश्यक उपकरणों पर उपदान दिया जाता है जोकि लघु किसानो को 25 प्रतिशत, सीमान्त किसानो को 33 प्रतिशत तथा अनुसूचित जाति/जनजाति, पिछड़े क्षेत्रों एवं आई०आर० डी० पी० से सम्बंधित परिवारों को 50 प्रतिशत की दर से उपलब्ध है |
  3. परागण सेवाएं
  4. बागवानी विभाग के द्वारा फल पौधों के परागण हेतु किसानो को न्यूनतम दरों पर मौन वंश प्रदान किये जाते है |
  5. प्रदर्शन एवं तकनिकी ज्ञान:
  6. प्रदेश भर के हर जिले में सरकारी मौन पालन केन्द्र कार्यरत है, जहां पर मौन पालन गृहों में प्रदर्शन के माध्यम से मौन पालकों को तकनीकी ज्ञान एवं प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है | राज्य में सरकारी मौन पालन केन्द्रों की विस्तृत सूची नीचे दी गई है |

    क्र.सं. जिलें का नाम मौन पालन केन्द्र का नाम
    1 शिमला 1. शिमला
    2.हाटकोटी
    3.समोलीपुल
    4.डोडराक्वार
    2 सोलन 1.कुनिहार
    2.कुठार
    3 .कंडाघाट
    3 सिरमौर 1.धौलाकुंआ
    4 बिलासपुर 1.निहाल
    5 मंडी 1. सुंदरनगर
    2. चौंतरा
    6 कुल्लू 1.  बियोनी
    2.  उरला
    3.  कोलिबेहर
    7 किन्नौर 1.कटगांव
    2.गायाबोंग
    3 किल्बा
    4 उरनी
    5. सपीलो
    8 चम्बा 1.  जुधेरा
    2.  सरोल
    3.  बाकनी
    4.  भरमौर
    5.  होली
    6.  लुना पुल
    9 काँगड़ा 1.घुरकरी
    2. जच्छ
    3.चैटरू
    10 हमीरपुर 1.भीरा
    11 ऊना 1.  बमगाना
    12 लाहौल स्पीति 1.टिंडी

 

ब . केन्द्रीय प्रायोजित योजनाएं:

 

वर्तमान में, उद्यान विभाग द्वारा मौन पालन विकास हेतु दो केन्द्रीय प्रायोजित योजनाएं चलाई जा रही है जिनका विवरण निम्नानुसार नीचे दर्शाया गया है |

क्र० सं०

योजना का नाम

घटकों के नाम

गतिविधि

मौन गृहों पर स्वीकार्य सहायता

1

उद्यान प्रौद्योगिकी मिशन

मौन पालन का विकास

मौन गृहों की छतों के साथ आपूर्ति पर रु०@ 800प्रति इकाई की सहायता

पहले से पंजीकृत मौन पलकों को 20 मौन गृहों और नए मौन पलकों को 50 मौन गृहों की सहायता प्रदान करना

2

राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (आर० के० वी० वाई० )

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