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चारे वाली फसलें


चारे वाली फसलें :-


हिमाचल प्रदेश की प्राकृतिक चरागाहें पशुओं के चारे की मुख्य स्रोत हैं| प्रदेश में कुल 32 लाख हैक्टेयर भूमि पशुओं के चरने के लिए उपलब्ध है जो कि प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 56.7% के लगभग है| यह चरागाहें 300-4800 मीटर ऊंचाई तक के क्षेत्रों में फैली हुई है जहां की जलवायु शीतोष्ण से समशीतोष्ण के मध्य रहती है| इन क्षेत्रों से 10-50 क्विंटल प्रति हैक्टेयर सूखा घास प्राप्त होता है यदि चरागाहों की उचित प्रबन्ध द्वारा देख-रेख हो तो इसे 100 क्विंटल/हैक्टेयर तक बढ़ाया जा सकता है| इन चरागाहों में वनस्पतिक बढ़ौतरी एक साल में केवल 4-5 महीने होती है जिसके कारण बाकि समय में हरे चारे की बहुत कमी हो जाती है| प्रदेश में कुल 800 हैक्टेयर क्षेत्र ही चारे की फसलें उगाने के लिए उपलब्ध है| चारे की पैदावार बढ़ाने और हरे चारे की पूरे साल उपलब्धता बनाए रखने के लिए यह जरुरी है कि चारे की उन्नत किस्मों के अंतर्गत क्षेत्र बढ़ाया जाएं| प्राकृतिक चरागाहों से अधिक घास प्राप्त करने के लिए उनके प्रबंध एवं सुधारने के लिए विशेष ध्यान देना पड़ेगा| मौनसून के मौसम में चरागाहों से आवश्यकता से अधिक घास को साइलेज के रूप में परीक्षण करना चाहिए ताकि इसका प्रयोग उस समय किया जा सके जब घास की कमी हो|


(क) प्राकृतिक चरागाहों का प्रबन्ध एवं सुधार :-


प्रदेश में चरागाहें अधिकतर ढलानों तथा पथरीली जमीनों पर हैं क्योंकि इनके सुधार एवं प्रबंध पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है अत: इनसे उत्पादन भी बहुत कम है| इनको सुधारने के लिए निम्नलिखित सिफारिशों का अनुमोदन किया गया है|


  1. चरागाहों में ठीक ढंग से काटने तथा चराने का प्रबंध :-

  2. यद्यपि घास को बार-बार काटा जा सकता है लेकिन इन्हें भी अन्य हरे पौधों की तरह अपनी खुराक बनाने के लिए पत्तों पर ही निर्भर रहना पड़ता है| अत: सही ढंग से काटने या चराने ही से अधिक चारा मिल सकता है| दूसरा यदि घासों को अधिक समय तक बढ़ने दिया जाए तो घास की पौष्टिक शक्ति कम हो जाती है क्योंकि फसल की बढ़ौतरी के साथ प्रोटीन की मात्रा कम हो जाती है| यह प्रयत्न करना चाहिए कि बरसात के मौसम के समाप्त होते ही चरागाहों से घास काटकर उसे सूखे घास में परिवर्तित कर लेना चाहिए| यदि चरागाहों की कटाई उस समय की जाए जब घासें पक गई हों तो इनमें पौष्टिक शक्ति बहुत कम रह जाती है| चरागाहों से बढ़िया हरा घास प्राप्त करने के लिए इनमें खादों का प्रयोग करना चाहिए तथा दो बार घास काटना चाहिए|


    चरागाहों/जंगलों में पशुओं को अधिक नहीं चराना चाहिए क्योंकि एक तो वहां उगने वाली किस्मों का विनाश हो जाता है और दूसरा घास भी कम होने लगता है| चूंकि सारे क्षेत्र में पशुओं को चरने से रोकना संभव नहीं होगा क्योंकि ऐसा करने के लिए कोई दूसरा क्षेत्र उपलब्ध नहीं हैं, अत: एक क्षेत्र में चरना बंद कर देना चाहिए और दूसरे क्षेत्र में चरना जारी रखना चाहिए| यह विधि बारी-बारी चरागाहों में अपनानी चाहिए| ऐसा करने से घासों को बढ़ने में पूरा समय मिल सकेगा| यह और भी अच्छा होगा कि एक क्षेत्र में घास काटना या चराना नहीं चाहिए जब तक घासों से बीज न झड़ गए हों जिससे फिर घास पैदा होने में सहायता मिलेगी|


  3. चरागाहों से झाड़ियों व दूसरे पौधों का उन्मूलन :-

  4. उन चरागाहों में जहां कोई ध्यान न दिया गया हो, वहां कैक्टस, फुलणू, बारबेरी जैसी झाड़ियां अधिक संख्या में पैदा हो जाती हैं| यह पौधे जमीन से नमी प्राप्त करने के लिए घासों के साथ होड़ लगाते हैं जिसके घासों के उत्पादन में प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है| अत: यह आवश्यक है कि चरागाहों से ऐसी झाड़ियों का उन्मूलन कर दें| इनके उन्मूलन के लिए परिशिष्ट -6 में दी गई विधियों को अपनाएं|


  5. चरागाहों में उर्वरकों का प्रयोग :

  6. वास्तव में चरागाहों में पशुओं द्वारा मल-मूत्र व गोबर ही खाद के रूप में प्राप्त होते हैं और इसके अतिरिक्त किसी भी प्रकार की खाद चरागाहों को नहीं मिलती है| अत: इनमें अंतत: तत्वों की कमी हो रही है जिससे घास के उत्पादन में बहुत कमी आ गई है| दूसरा फलीदार फसलें भी इन चरागाहों में नहीं होती हैं जो भूमि में नाईट्रोजन बढ़ाने की क्षमता रखती है| जैसे ही घास की पैदावार कम होती है तो उगने वाले घासों की प्रजातियों में बढ़ने की होड़ खत्म हो जाती है| और तब कम उपजाऊ भूमि में उगने वाले पौधे इन चरागाहों में पैदा होकर फैलने लगते हैं| नाईट्रोजन फास्फोरस, पोटाश, सल्फर, चूना व मैगनीशियम चरागाहों में उगने वाले घासों के लिए आवयश्क हैं| इनके अतिरिक्त मोलीबडीनम, कॉपर, जिंक, मैंगनीज, बोरान व लोहा तत्व भी कम मात्रा में आवश्यक हैं| किसी भी चरागाह के लिए खादों की पर्याप्त मात्रा, इनकी स्थिति, प्राकृतिक दशा व मिट्टी परीक्षण के आधार पर निर्भर करती है|

    80 कि.ग्रा. नाईट्रोजन और 60 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टयेर देने से सामान्य ढलान वाले मध्यवर्ती क्षेत्रों में घास की पैदावार में 200 प्रतिशत तक वृद्धि पाई गई है| नाईट्रोजन खाद देने से घास में प्रोटीन की मात्रा बढ़ती है| प्राकृतिक चरागाहों में खाद डालते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि ढलान बहुत अधिक हो तो खाद पहाड़ी की ऊंची तरफ से देनी चाहिए| जब बरसात से पहले की बारिशें हो तो उस समय खाद चरागाहों में देनी चाहिए| नाईट्रोजन खाद को बराबर भागों में बाँट कर 2-4 बार देने से अधिक पैदावार होने की संभावाना रहती है|


  7. चरागाहों में फलीदार फसलें लगाना :

  8. हिमाचल प्रदेश में पशु फसलों की तूड़ी और सूखे घास के भोजन पर निर्भर रहते हैं जिससे उन्हें शक्ति तो मिलती है परंतु पचने-योग्य प्रोटीन नहीं मिलती है| ऐसी खुराक न मिलने के कारण देसी व विदेशी पशुओं की प्रजनन क्षमता व बढ़ौतरी में कमी आती है| तूड़ी व सूखे घास को प्रोटीन युक्त खलों या फलीदार फसलों के साथ मिलाकर खिलाया जा सकता है| प्रदेश की चरागाहों में फलीदार फसलें बिल्कुल ही कम पाई जाती हैं| फलीदार फसलें लगाने से घास प्रोटीनयुक्त व अन्य आवश्यक तत्वों वाला प्राप्त होगा| नीचे दी गई फलीदार फसलों को प्रदेश के विभिन्न भागों में फ़ैली चरागाहों में लगाया जा सकता है|


  9. फलीदार फसल बीज की मात्रा (कि.ग्रा./है.)

  10. क्षेत्र-1

    फलीदार फसल बीज की मात्रा (कि.ग्रा./है.)
    सिराट्रो 6 - 8
    फील्ड बीन 6 - 8
    रौंगी 30
    वैलवैट बीन 30

    क्षेत्र-2

    फलीदार फसल बीज की मात्रा (कि.ग्रा./है.)
    फील्ड बीन 6 – 8
    व्हाईट क्लोवर 3 - 5
    रैड क्लोवर 10-12

    क्षेत्र-3

    फलीदार फसल बीज की मात्रा (कि.ग्रा./है.)
    रैड क्लोवर 10-12
    व्हाईट क्लोवर 3 – 5

    क्षेत्र-4

    फलीदार फसल बीज की मात्रा (कि.ग्रा./है.)
    रिजका (लुर्सन) 15
    व्हाईट क्लोवर 3 – 5
    रैड क्लोवर 10-12

    इन फलीदार फसलों को सुचारू ढंग से स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि बीज को सही टीके (राइजोबियम कल्चर) से उपचारित करें और 60 कि.ग्रा. फास्फोरस व 100 ग्रा. मोलीवडीनम तत्व प्रति हैक्टेयर दें| कुछ स्थानों पर इनकी अच्छी स्थापना व बढ़ौतरी के लिए मैगनिशियम व बोरान तत्वों का देना भी आवश्यक है|


    विधि :

    15 सैं.मी. व्यासार्ध व 20 सैं.मी. के गहरे गड्ढे करें और सब प्राकृतिक घासों को चरागाहों से निकाल दें| इन गड्ढों में उर्वरकों को अच्छी तरह से मिलाएं व फिर बीज को बिखेर कर मिट्टी में मिला दें| यह बिजाई क्षेत्र-2 में जून के अंत, क्षेत्र-3 में अक्तूबर व क्षेत्र-4 में अप्रैल में करें|


  11. चरागाहों में उन्नत किस्म की घासें लगाएं :

  12. कमजोर चरागाहों व घासनियों, बंजर और ऊसर जमीनों में अधिक उपज देने वाली तथा पौष्टिक घासें लगाने से घास के उत्पादन में ही वृद्धि नहीं होती बल्कि हरे चारे की उपलब्धि 3-4 महीने से बढ़कर 7-8 महीने हो जाती है| विभिन्न क्षेत्रों में निम्नलिखित घासें उगाने के लिए उपयुक्त पाई गई है :


    क्षेत्र-1

    37 नेपियर बाजरा हाईब्रिड (आई जी-7, एन बी)
    गिन्नी ग्रास
    ग्रीन पैनिक
    साबी ग्रास


    क्षेत्र-2 सिटेरिया (पी एस एस-1)
    नेपियर बाजरा हाईब्रिड (आई जी-7, एन बी -37)
    पैनीकम (एस जी जी-2)
    पसपालम (चौड़े पत्तों वाला)
    किक्यू ग्रास


    क्षेत्र-3

    आर्चर्ड ग्रास (कोमट, सुमैक्स)
    फैसक्यू (हिमा-1)
    कैनरी ग्रास (कामन कैनरी ग्रास)
    तिमोथी (क्लेयर, युगमे)


    क्षेत्र-4

    फैसक्यू (हिमा-1)
    आर्चर्ड ग्रास (कोमट, सुमैक्स)
    एग्रोपायरॉन


  13. बिजाई का तरीका :

  14. नई घास की जड़ें कमजोर होती है और स्थापित होने में अधिक समय लगती हैं| कई बार तो छाया के कारण अथवा पहले से ही उग रही घासों द्वारा समाप्त कर दी जाती हैं| अत: यह आवश्यक है कि पहले इनकी नर्सरी में बिजाई करें और फिर दूसरे वर्ष पौध को खेतों में लगाएं| पतली घासों को मिट्टी के साथ ही झुंड में लगा दें जबकि मोटी घासों जैसे नेपियर बाजरा हाईब्रिड में एक-एक पौध को लगाया जा सकता है| 30 सैं.मी. की दूरी की पंक्तियों में पौधे को 20 सैं.मी. के फासले पर लगाएं| उन क्षेत्रों में जहां पौधे को पहुंचाना कठिन हो, वहां पर गोलाकार गड्ढे में बिजाई करने वाली विधि अपनानी चाहिए|


  15. चरागाहों में चारे वाले वृक्ष लगाना :

  16. चारे वाले वृक्षों व झाड़ियों से उस समय हरा चारा प्राप्त होता है जब दूसरी घासें सूख गई होती हैं या निद्रतावस्था में होती हैं| कमी वाले समय में चारा देने के अतिरिक्त इनका कृषि योग्य भूमि पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है क्योंकि इनको बंजर भूमि, चरागाहों और खेत की मेढ़ों पर ही लगाया जाता है और उसके बाद इनकी बहुत कम देखभाल करनी पड़ती है| प्रदेश के विभिन्न खंडों के लिए कुछ चारे वाले वृक्ष निम्नलिखित है|


    खण्ड-1 :- ढइयूं, कचनार, खैर, लसूरा, बांस, बेर, ल्यूसिनिया, शहतूत, ब्यूल
    खण्ड-2 :- कचनार, ब्यूल, खिड़क, बांस, शहतूत, सफेदा, रोबिनिया
    खण्ड-3 :- रोबिनिया, पॉपलर, खिड़क
    खण्ड-4 :- विलो, पॉपलर, (तिलन्जना), इण्डियन पॉपलर, रोबिनिया


  17. बिजाई का समय :

  18. अक्तूबर से पहले पखवाड़े से नवम्बर के अंत तक इसकी बिजाई के लिए उत्तम समय माना गया है|


  19. बीज की मात्रा एवं बिजाई का ढंग :

  20. 15 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर पर्याप्त है| पंक्तियों में 40 सैं.मी. का अंतर होना चाहिए| इसका बाहर का छिलका मोटा होता है| अत: बीज को बिजाई से पहले रात भर के लिए भिगोकर रखें| बरसीम की तरह इसमें भी टीका करना चाहिए यदि किसी खेत में पहली बार इस फसल को लगाया जा रहा है|


  21. खाद व उर्वरक :

  22. बिजाई के समय 25 कि.ग्रा. नाईट्रोजन व 60 कि.ग्रा. फास्फोरस प्रति हैक्टेयर डालनी चाहिए| यदि भूमि अम्लीय हो तो बिजाई से एक महीना पहले, मिट्टी परीक्षण के आधार पर, चूना मिला देना चाहिए|


  23. सिंचाई :

  24. बिजाई के लगभग एक महीने बाद सिंचाई कर देनी चाहिए और इसके बाद मौसम के अनुसार 15-30 दिन के अंदर सिंचाई करनी चाहिए| बरसात के मौसम में पानी को खेत में खड़ा नहीं रहने देना चाहिए|


  25. कटाई:

  26. नई उगाई गई फसल लगभग 2-4 महीनों में पहली कटाई के लिए तैयार हो जाती है जो क्षेत्र के आधार पर निर्भर करती है| उसके बाद 30-40 दिनों के अंतर पर कटाई ली जा सकती है|


  27. बीज तैयार करना :

  28. यदि फसल को चारे के लिए न काटा गया हो तो बीज की अच्छी उपज मिलती है| यदि फसल से बीज प्राप्त करना हो तो जनवरी के बाद कटाई नहीं करनी चाहिए| लगभग 50 कि.ग्रा. बीज प्रति हैक्टेयर प्राप्त होता है|


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